राजस्थान समाचार : श्रीगंगानगर - रामलीला में सीता स्वयंवर व अहिल्या उद्धार प्रसंग को कलाकारों ने किया जीवंत

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श्रीगंगानगर : श्री सनातन धर्म हनुमान राम नाटक समिति, श्रीगंगानगर के तत्वाधान में आधुनिक लाईटिंग व नवीन तकनीक से रामलीला मैदान में आयोजित भव्य रामलीला का मंचन पूरे विधि-विधान एवं मर्यादा के साथ किया जा रहा है। मंगलवार को मुख्य अतिथि धर्मवीर डुडेजा, कुलदीप चारण, वैभव शर्मा, प्रिंस गर्ग, मोहित जुनेजा व विनय जिंदल थे। सभी अतिथियों का अध्यक्ष ओम असीजा, सचिव राज जनवेजा, संचालक चोरदास हर्ष, स्वागताध्यक्ष ताराचंद खत्री, कोषाध्यक्ष दीपक जसूजा, उपाध्यक्ष टीकम चंद गर्ग, सोनू अनेजा, कृष्ण असीजा, इन्दुभूषण चावला, रामलीला युवा मंच के अध्यक्ष निश्चय जनवेजा, रामलीला प्रभारी मनीष असीजा, राजेश असीजा, भूपेन्द्र असीजा, राजेश वाट्स एवं सदस्यों व कलाकारों द्वारा फूलमालायें पहनाकर एवं सम्मान प्रतीक भेंट कर सम्मानित किया गया।


रामलीला में कलाकारों ने दृश्य जीवंत किया कि महर्षि विश्वामित्र को मिथिला नरेश जनक का निमंत्रण मिला, जिसमें उन्हें उनकी पुत्री सीता के स्वयंवर पर सादर आमंत्रित किया गया। विश्वामित्र के आदेशानुसार दोनों भाई (राम व लक्ष्मण) भी मिथिला नगरी पहुँचे। मार्ग में राम और लक्ष्मण ने एक आश्रम देखा, जो वीरान पड़ा था। आश्रम के बाहर पत्थर की एक शिला थी। श्रीराम ने महर्षि विश्वामित्र से पूछा भगवान यह वीरान आश्रम किसका है और पत्थर की शिला कैसी है? तब मुनि ने बताया कि यह आश्रम गौतम मुनि का है और पत्थर की यह शिला उनकी पत्नी अहिल्या है। अपने पति के शाप के कारण ही अहिल्या की यह दशा हुई है। गुरूजी ने पूरी कहानी सुनाकर कहा कि अब यह शिला वर्षों से तुम्हारी चरणधुली की प्रतीक्षा कर रही है। 


राम जाओ, इसका उद्धार करो। इस प्रकार श्रीराम ने अहिल्या का उद्धार किया। तत्पश्चात् मुनि विश्वामित्र, राम व लक्ष्मण मिथिलापुरी पहुँचे। सभी उनकी सुन्दरता देकर मोहित हो गये। स्वयंवर में कोई भी राजा महाराजा जनक की शर्त पूरी नहीं कर पाने के कारण निराश हो गये तथा बोले कि हे विधाता यदि मुझे पहले पता होता कि धरती शुरवीरों से खाली हो गयी है तो मैं ऐसी प्रतिज्ञा कदापि नहीं करता। इतना कहकर राजा जनक निढ़ाल होकर अपने आसन पर गिर पड़े।


मुनि विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम ने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर राजा जनक का संताप दूर किया। धनुष के टूटते ही सम्पूर्ण दिशायें कम्पायंमान हो उठी। कुछ देर बाद जब वह भयानक शोर शांत हुआ, तब स्वयंवर स्थल पर खुशी के ढोल-नगाड़े और शहनाईयां बज उठी। सीताजी की सखियां मंगल गीत गाने लगी। राजा जनक की आज्ञा से श्रीराम के गले में वरमाला डालते ही दशों दिशाओं में आनन्द छा गया। राजा जनक ने महाराजा दशरथ को बुलाने के लिए अपने दूत को अयोध्या भेजे। रामलीला के इन प्रसंगों का कलाकारों ने बहुत मनमोहक अंदाज में मंचन किया, जिसे देखकर सभी दर्शक भाव-विभोर हो गये तथा भगवान श्रीराम, माता सीता के जयकारों से सारा वातावरण गुंजायमान कर दिया। सचिव राज जनवेजा ने उपस्थित समस्त अतिथियो, कलाकारों एवं दर्शकों का आभार व्यक्त किया गया। इस अवसर पर भारी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु दर्शक उपस्थित थे।










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