एक तरफ उत्तर प्रदेश के सीएम अपराधियों के घर तोड़ रहे हैं , दूसरी ओर उनके अधिकारी अपराधियों को लोगों के घरों पर कब्जा करवाने में मदद कर रहे हैं , आवाज उठाने पर ऑफिस में बुलाकर की जाती है पिटाई, जानिए इस बुजुर्ग का दर्द

कबजा हुआ घर पर  शिकायत करने गए बुजुर्ग पर  हाथ उठाया अधिकारियों न क्या फर्क पड़ता है…कौन सा पहाड़ टूट गया अगर साहब ने थप्पड़,दो थप्पड़ मार दिया

 


आप भले सालों से परेशान हों.मगर,आवाज़ में गूंज नहीं होनी चाहिये थी खासकर हुक्मरानों के सामने


कहीं आप जनता जनार्दन या लोकतंत्र में जनता ही मालिक है वाले भ्रम में तो नहीं फंस हुये थे.आप को लगा सामने गवर्नमेंट सर्वेंट है जनसेवक है जो हमारी सेवा व सुनवाई के लिये बैठा है तो जान लीजिए ये साहब साठ साल की उम्र तक के स्थाई मालिक होते हैं इनको मनमानी करने की सरकारी छूट होती है.इनका आज तक न कोई कुछ बिगाड़ पाया है और न आगे बिगाड़ पायेगा.


अब इस विभाग के मुखिया को ही देख लीजिये.कहा जाता है जन सुनवाई में जल्दी आते नहीं आज भी घटना के समय नदारद थे वैसे तो उनके ही खिलाफ तमाम आरोप प्रत्यारोप हैं पर साहब उस शीर्ष के अफसर के प्यारे हैं जिनका प्यारे होने पर सब अपराध माफ. उनके नाम का कवच जिस अफ़सर के सिर और शरीर पर होता है उसको गलती या अपराध भेद नहीं पाती .सब माफ़ होता है कोई सजा नहीं दे सकता



विभाग के मुखिया इससे पहले राजधानी के जिस विभाग में तैनात थे वहाँ आये दिन कितना बवाल हुआ करता था पर क्या फ़र्क़ पड़ा फिर लखनऊ में तैनात

अंतिम बात.अगर प्राइवेट बिल्डर तय समय पर घर-जमीन न दे तो वह भू माफिया अब एक सवाल प्राधिकरण, आवास-विकास तय समय सीमा पर जमीन-घर न दें तो क्या 








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