राजस्थान समाचार: श्रीगंगानगर भारतीय जैन संगठन द्वारा विद्यार्थियों के लिए 10 पंखे भेंट किए गए बच्चों के सर्वांगीण उत्थान के लिए कहानियों की पुस्तकें प्रदान की गई

कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। प्रधानाचार्य रिम्पा तिलवार ने भारतीय जैन संगठन के सभी पदाधिकारियों, सदस्यों व अतिथियों का विद्यालय की ओर से अभिनंदन किया


श्रीगंगानगर : भारतीय जैन संगठना श्रीगंगानगर द्वारा महात्मा गाँधी राजकीय विद्यालय अंग्रेजी माध्यम, पुलिस लाईन, श्रीगंगानगर में गर्मी के मौसम को देखते हुए विद्यार्थियों के लिए 10 पंखे भेंट किए गए। इसके साथ-साथ बच्चों के सर्वांगीण उत्थान के लिए कहानियों की पुस्तकें भी प्रदान की गई। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि चन्द्रकला रीजनल इंस्पेक्टर पुलिस लाईन व समाजसेवी नरेश जैन थे तथा अध्यक्षता इंजी. राहुल जैन ने की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि दीपक जैन, मुकेश सेठी, श्रीमती शशि बाला गुप्ता, राजकुमार मक्कड़ एवं स्वागताध्यक्ष प्रधानाचार्य रिम्पा तलवार थे। कार्यक्रम के सफल आयोजन में सुमनलता, शकुंतला, गोल्डी पाहुजा, इन्दुभूषण चावला, रितु, दीपाली, नेहा आदि का सराहनीय सहयोग रहा।  

कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। प्रधानाचार्य रिम्पा तिलवार ने भारतीय जैन संगठना के सभी पदाधिकारियों, सदस्यों व अतिथियों का विद्यालय की ओर से अभिनंदन किया तथा बताया कि इस गर्मी के मौसम में विद्यार्थियों के लिए पंखों की अत्यंत आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इससे विद्यार्थियों को काफी राहत मिलेगी। कहानी की पुस्तकों से बच्चों में पढऩे का उत्साह बढ़ेगा तथा पढऩे की प्रेरणा मिलेगी। बच्चों को बालोपयोगी, शैक्षिक, खेलकूद, मनोरंजन, कला, नैतिक शिक्षा, धर्म व सामाजिक ज्ञान सम्बन्धी पुस्तकें उपलब्ध करवाई गई है। पुस्तकें हमारी प्रिय मित्र हैं। बच्चों में पढऩे की ललक देखी जा रही है। 



पुस्तकों में विशाल ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है। कितने ही लोगों ने अनथक परिश्रम करके बाल साहित्य की पुस्तकें तैयार की है। ये पुस्तकें हमें हर जरूरतमंद बालक तक पढऩे हेतु पहुंचानी है। समाजसेवकों व भामाशाहों की प्रेरणा से अगर बालक पुस्तकें पढ़ता है तो यह बात बालकों के लिए सार्थक सिद्ध हो जाएगी कि पुस्तकें जीवन में सफलता के नए द्वार खोलती हैं तथा उन्नति का मार्ग प्रशस्ती करती हैं।

नरेश जैन ने बताया कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य अच्छे संस्कार का निर्माण, अच्छे आचरण और अच्छा चरित्र निर्माण है। आज के वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपेक्षित है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हृदय है- सत्य की खोज निरन्तर जारी रहे, अनवेषण का द्वार बंद न हो। उत्तम संस्कारों के लिए बालिका संरक्षण हमारा दायित्व है। बालिका पढ़े, राष्ट्र आगे बढ़े इसके लिए सबने अपना सहयोग देना है। कन्या भू्रण हत्या अभिशाप है तथा समाज पर कलंक है। लडक़ा-लडक़ी एक समान हैं। पर्यावरण की सुरक्षा कर विश्व कल्याण का भाव अपनाना आज के समय की आवश्यकता है। पशु-पक्षियों के प्रति सदैव दया का भाव रखें। माता-पिता व गुरु की सेवा करना हमारा धर्म है। बड़े-बुजुर्ग परिवार व समाज के अनमोल रतन हैं। 



मातृशक्ति राष्ट्रशक्ति है, जिनका सदैव सम्मान करना चाहिए। अच्छा सोचिये, अच्छा बोलिये और अच्छा कीजिये, क्योंकि सब कुछ आपके पास वापिस लौटकर आता है। मातृ देवो भव - आईये माँ के कार्यों में हाथ बंटाएं, अनाथ बालक-बालिकाओं के प्रति सुरक्षा के हाथ बढ़ाएं। विशेष आवश्यकता वाले बालकों के प्रति हमारा फर्ज है कि जहां तक सम्भव हो सके, उनकी सहायता करें। परिवार के प्रति मन में उत्तम व प्रेम का भाव हो। संयुक्त परिवार सुरक्षा का आधार है। एक भलाई का काम रोजाना करें। विद्यालय परिवार के प्रति संरक्षण भाव से शिक्षा के क्षेत्र में पूर्ण योगदान दें। स्वास्थ्य की आधारशिला नियमित व्यायाम, अच्छा खान-पान एवं स्वच्छता है। परिश्रम में सफल्ता निहित है तथा सामुदायिक जीवन ही सुरक्षित है।

इंजी. राहुल जैन ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पृथ्वी के हरा-भरा बनाने हेतु पेड़-पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल करने के लिए प्रेरित किया। बच्चों को कड़ी मेहनत करके शिक्षा हासिल करने तथा परिवार व देश का नाम रोशन करने के लिए अनुशासन को अत्यंत आवश्यक बताया। बाल्यकाल में शिक्षा का अत्यंत महत्व है तथा शिक्षा बालक के लिए अत्यंत उपयोगी और मूल्यवान है। उचित शिक्षा से ही स्वस्थ एवं समृद्ध समाज का निर्माण होता है।







इसके द्वारा हम विश्व की ज्ञानात्मक परम्परा को आगे बढ़ाने के योग्य बनते हैं। जब हम बच्चों या युवा लोगों के सम्पर्क में आते हैं तो हमें समझना चाहिए कि हम मशीनी संरचनाओं से व्यवहार नहीं कर रहे हैं, जिनको हमें जल्दी से मरम्मत कर ठीक देना है, बल्कि हम ऐसे जीवित प्राणियों से व्यवहार कर रहे हैं, जिनको आसानी से प्रभावित किया जा सकता है, जो चंचल और संवेदनशील हैं, जो भय और प्रेम से परिपूर्ण हैं। उनके साथ व्यवहार करने से हमें अत्याधिक समझ, धैर्य और प्रेम की एक बड़ी शक्ति की आवश्यकता है।

दीपक जैन ने बताया कि विद्यालय आने पर बचपन की यादें ताजा हो जाती है। हम कैसे शिक्षा ग्रहण करते थे, वह दिन हमारी जिंदगी की अनमोल धरोहर हैं। स्कूलों में हमारी हैण्डराइटिंग अर्थात् सुलेख पर बहुत जोर दिया जाता था। अक्षरों के मोड़, अंकों के मोड को विभिन्न वस्तुओं से उपमा देकर अभ्यास करवाया जाता था। नियमित रूप से एक पृष्ठ का सुलेख लिखवाया जाता था। वर्तनी एवं व्याकरण की शुद्धता के लिए देखकर लिखते वक्त लेख का अभ्यास करवाया जाता था। देखकर लिखने में पाई जाने वाली गलतियों की संख्या को देखकर बच्चों की एकाग्रचित्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है। देखकर भी सही नहीं लिखने का अर्थ यही है कि ध्यान कहीं ओर था। अर्थात् एकाग्रचित्त नहीं थे, हमें भी अपने बच्चों के सुलेख पर विशेष ध्यान देना है।  




मुकेश सेठी द्वारा बालिकाओं को आत्मरक्षा के गुर बताए गए तथा कहा कि आत्मबल व आत्मविश्वास से हर समस्या का आसानी से समाधान सम्भव है। स्मार्ट गर्ल पर प्रकाश डालते हुए विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रकृति की रक्षा करना हमारा धर्म है। प्रकृति प्राणीमात्र का जीवन है। इसलिए इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य ही नहीं, अपितु परम धर्म है। जबसे हमने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर उसका अंधाधुंध दोहन आरम्भ किया है, तबसे वह समाज पर कुपित है तथा मौसम ने भी अपना विपरीत, विनाशक और उग्र रूप धारण कर लिया है। यही कारण है कि जहां हमारे तीन मौसम और छ: ऋतुओं का समय चक्र निश्चित था, वह सब परिवर्तित हो गया है। प्रकृति पर हम चिंतन करें तथा जंगल, जल, जमीन और जीवों को बचाने का दृढ़ संकल्प लें, तभी हमारी प्रकृति सुरक्षित रह सकती है।

श्रीमती शशि बाला गुप्ता ने बालक-बालिकाओं को ‘बैड टच - गुड टच’ की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शिक्षा के साथ-साथ हमें बालक की अन्य गतिविधियों पर ध्यान देना होगा। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास करना है, उन्हें अच्छा नागरिक बनाना है। बालकों के चरित्र का निर्माण करना है। ऐसे में अधिक से अधिक अंकों को हासिल करने की होड़ को विराम लगाना जरूरी है, ताकि बच्चे निश्चिंत होकर समान रूप से बौद्धिक, शारीरिक व मानसिक विकास कर सकें। ऐसा तभी हो सकता है,


जब पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे अन्य रचनात्मक गतिविधियों में भी भाग लें तो उनका आत्मविश्वास दृढ़ होता है। पढ़ाई के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान भी अत्यंत जरूरी है तथा बच्चों के जीवनभर काम आता है। इस अवसर पर भारतीय जैन संगठना पदाधिकारी व सदस्य, विद्यालय स्टाफ, छात्र-छात्रायें एवं गण्यमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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