अरूट जयंती (30 मई) पर विशेष

स्वाभिमानी, मेहनतकश, स्वावलम्बी, मार्शल कौम अरोड़वंश के आदि प्रवर्तक अरूट जी महाराज

अरोड़वंश समाज के आदि प्रवर्तक महाराज अरूट जी थे, जो सूर्यवंशी क्षत्रिय थे और उनका गोत्र कश्यप था। महाराजा अरूट के वंशज अरोड़वंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। अरूट जी महाराज एक महान तपस्वी, वीर शस्त्रधारी, क्षत्रिय कौशल में निपुण तथा गऊ व ब्राह्मण का सत्कार करते थे। अरोड़वंश जाति में धैर्य, बुद्धि, साहस, वीरता, जाति प्रेम, धर्म के प्रति आस्था कूट-कूट कर भरी हुई है। अरोड़वंश समाज कठिन परिस्थितियों से विचलित नहीं हुये तथा नई जगहों पर विस्थापित होने पर भी अपनी मेहनत के कारण उन्होंने अपनी सफलता का डंका बजाया। अरोड़वंश भारत मूल की हिन्दु जाति का प्रमुख अंग है, जो कि कर्मशील एवं प्रगतिशील जातियों में से एक है, यह एक स्वाभिमानी, स्वाबलम्बी, मेहनतकश और लगनशील लोगों का एक समुदाय है, जिसने सामाजिक, राजनैतिक, शिक्षा, रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पूरे कर्मयोग से सेवा कर हर क्षेत्र में विशिष्ट ख्याति अर्जित की है एवं कर रहे हैं। अरोड़वंश एक ऐसी कौम है, जिसने लम्बी जद्दोजहद के बाद अपने को बचाया तथा अपनी मेहनत व लगन से अपना रूतबा कायम रखा। 



अरोड़वंश एक मार्शल कौम है, जिसका धैर्य और धर्म के आधार पर ही इस जाति का अस्तित्व आज तक विद्यमान हैं। अरोड़वंश जाति में जाति-प्रेम और जाति सेवा का भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। केवल यही नहीं कि यह सेवा-भाव केवल अरोड़वंश जाति तक ही सीमित हो, अपितु मनुष्य मात्र के लिए इस अरोड़वंश जाति का हृदय विशाल है। भारतवर्ष के प्रमुख स्थानों पर अरोड़वंशियों की धर्मशालायें, मन्दिर, कुंए, सरायें, तालाब, घाट, पब्लिक हॉल, जंजघर, लंगरखाने, धर्मार्थ औषधालय इत्यादि बने हुए हैं। कोई तीर्थ अथवा बड़ी मण्डी ऐसी न होगी, जहां अरोड़वंश जाति की सेवा का प्रमाण न मिलता हो।


अरोड़वंश जाति द्विजन्मा क्षत्रिय वर्ण से है, जो सर्वसाधारण में अरोड़ा और पढ़े-लिखों में अरोड़वंशी कहलाते हैं। अरोड़वंश की लगभग 814 उपजातियां हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश व राजस्थान में अरोड़े क्षत्रियों (खत्रियों) के नाम से पुकारे जाते हैं। अरोड़वंश जाति में सभी प्रकार के धार्मिक विचार रखने वाले सनातनधर्मी, आर्यसमाजी, सिक्ख, देवसमाजी, राधास्वामी एवं दूसरे कई सम्प्रदायों को मानने वाले आस्तिक-नास्तिक सभी अरोड़वंशी हैं तथा पूजा-पद्धति अलग होने के बावजूद सभी मिल-जुलकर रहते हैं।


अरोड़वंश जाति की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जैसा कि भविष्य पुराण से ज्ञात होता है कि महाराज श्री परशुराम जी के समय अरोड़वंश की उत्पत्ति हुई है। त्रेता युग में श्री परशुराम जी ने क्रोधित होकर ब्रह्मतत्व के विरूद्ध क्षत्रियों की भांति फरसा उठाकर अधर्मी क्षत्रियों का नाश करने का प्रण कर लिया तथा समस्त आर्यवर्त् देश में घूम-घूम कर क्षत्रियों का वध करना शुरू कर दिया। जब परशुराम जी ऐसा कर रहे थे, तब उन्हें एक शस्त्रों से सुशोभित एक शूरवीर मिला, जिसके मुख पर वीरता का तेज झलक रहा था। यह तेजस्वी एवं वीर शस्त्रधारी महाराज अरूट थे, जिन्होंने परशुराम जी को सादर नमस्कार किया तथा परशुराम जी के पूछने पर उन्होंने अपना नाम, अपनी धर्म-मर्यादा के अनुसार गऊ एवं ब्राह्मण का सत्कार करने वाला ‘अरूट’ बताया। 


परशुराम जी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि हे शस्त्रधारी अरूट, तुम देश से चले जाओ और सिंधु नदी के किनारे जाकर अपना राज्य स्थापित करो। महाराज श्री अरूट जी ने अपने कुटुम्बियों और साथियों को साथ लेकर सिन्धु नदी के किनारे एक किला बनाकर उसका नाम ‘अरूट कोट’ रखा और अपना राज्य स्थापित किया, जिसे ‘अरोडक़ोट’ कहा जाने लगा एवं महाराज अरूट के वंशज एवं साथी ही अरोड़ कहलाये, जो समय के परिवर्तन में अरोड़ा कहे जाने लगे। अरोड़वंश जाति पर कई बार विपत्तियां आई तथा विभिन्न आक्रमणों से अरोड़ा विस्थापित होते रहे। 1947 में भारत विभाजन के अवसर पर इस जाति को फिर उजडऩा पड़ा, परन्तु अरोड़ा जाति के लोगों में हिम्मत व हौंसले से इस जाति के लोगों ने अपने पांव पर खड़े होकर एक मिसाल पैदा कर दी।


अरोड़वंश जाति अपने पुरुषार्थ से कमाया हुआ धन एकत्रित करना अपना धर्म मानती है। यही कारण है कि अरोड़वंशियों में मुजरिम, भीख मांगने वाले तथा अपराधी नहीं पाये जाते हैं। अरोड़वंश जाति के लोग किसी भी काम को हाथ से करने में लज्जा महसूस नहीं करते हैं। अरोड़वंशी हर मुश्किल में अपना रास्ता बना लेते हैं। अरोड़वंश समाज के माथे पर, जो ‘रिफ्यूजी’ शब्द का कलंक था, वह आज अरोड़वंशियों ने अपनी मेहनत, मिलनसारता, कर्मठता, ईमानदारी, व्यवहारकुशलता व सकारात्मक सोच के जज्बे से इस कलंक को मिटाया है। अरोड़वंश समाज के पुरुष व महिलाओं ने राष्ट्र निर्माण में सशक्त भूमिका अदा की है। अरोड़वंश समाज ने इस देश में बड़ी-बड़ी हस्तियों को जन्म दिया, जिन्होंने पूरे देश में अपनी पहचान बनाई है, जिनमें मुख्य रूप से पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल, पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा, जगजीत सिंह अरोड़ा, मदनलाल खुराना, अजय आहुजा, कल्पना चावला, सुनील अरोड़ा जैसी महान शख्यियतों ने अरोड़वंश समाज का गौरव बढ़ाया है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी अरोड़वंश जाति ने भारतवर्ष में ही नहीं, विदेशों में भी जैसे यूरोप, अमेरिका,  जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड, रूस आदि देशों की यूनिवर्सिटी से बड़ी-बड़ी उपाधि प्राप्त की है। शिक्षा के कारण ही आज देश व विदेशों में सरकारी और गैर सरकारी विभागों, बड़ी-बड़ी कम्पनियों में अरोड़वंशी विभागाध्यक्ष, इंजीनियर्स, डॉक्टर, वकील, सीए, वैज्ञानिक बनकर पूरे विश्व में अपना परचम लहरा रहे हैं। देश-विदेश के उद्योग-धंधें, कला-कौशल, व्यापार में भी अरोड़वंश जाति के लोगों ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। अरोड़ा जाति के लोग अपने धर्म व देश की रक्षा के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिये तत्पर रहते हैं।

फिल्म इण्डस्ट्री, बड़े-बड़े कारखानें, मिलों, फैक्ट्रियों, उद्योगों सहित हर क्षेत्र में अरोड़वंश जाति का दबदबा है। आज के बदलते हुए युग में नई पीढ़ी की सोच व दिशा में परिवर्तन लाने की जरूरत है तथा नई चुनौतियों के अनुरूप अरोड़वंश समाज को ढालने की जरूरत है।

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अरूट जी महाराज की जयंती पर सभी अरोड़वंशी संकल्प लें कि अरोड़ा समाज में फैली हुई कुरीतियां दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, मृत्यु भोज, शादियों में अनावश्यक व्यय, दिखावा संस्कृति का त्याग करना होगा, नौजवान पीढ़ी को नशे से बचाना होगा तथा अभावग्रस्त, बेसहारा, उपेक्षित, वंचित एवं जरूरतमंद अरोड़वंशी वर्ग के उत्थान एवं आत्मविकास के लिए प्रयास करना होगा, अन्य समाज व धर्मों को सम्मान देना होगा। अरोड़वंश को आरक्षण की मांग भी उठाई जानी चाहिए। इसके साथ-साथ अरोड़वंश समाज के लोगों को पाश्चात्य सभ्यता में फंसते जा रहे युवाओं को मार्गदर्शन देकर भारतीय संस्कृति से जोडक़र पूरी दुनिया में एक मिसाल पेश करनी होगी। अरोड़ा जाति अरूट जी महाराज को शत्-शत् नमन् करती है, जिन्होंने अरोड़वंशियों को एक ईमानदार, मेहनती कौम का पाठ पढ़ाया।








     मनीराम सेतिया (अरोड़ा) सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य 109 एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर मो. 98871-22040              

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