7 मई विश्व विख्यात साहित्यकार व महान दार्शनिक रविन्द्रनाथ टैगोर जंयती पर विशेष

भारतीय संस्कृति के पुरोधा नोबल पुरस्कार से सम्मानित विश्व विख्यात साहित्यकार रविन्द्र नाथ टैगौर

‘गुरुदेव’ के नाम से विख्यात रविन्द्र नाथ टैगोर विश्व विख्यात साहित्यकार व महान दार्शनिक थे, जिनकी कवितायें, गीत, नाटकों व कहानियों ने देश में स्वतंत्रता की अलख जगाई तथा प्राचीन भारत के गौरव को प्रकट किया। साथ ही नवीन भारत के निर्माण की प्रेरणा प्रदान की। रविन्द्र नाथ टैगोर ने सभी विधाओं में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास गद्य और बाल कथा की रचना की तथा उनके गीत, नाटक व कहानियों ने पूरे देश में देशभक्ति का शंख बजाया। वे एशिया के प्रथम नोबल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं तथा वे एक मात्र विश्व विख्यात कवि हैं, 


जिनकी दो रचनायें दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ तथा बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार’ उन्हीं की रचना है। रविन्द्रनाथ टैगोर कुशाग्र बुद्धि के थे, जिन्होंने 13 से 17 वर्ष की अवस्था तक घर पर विभिन्न विषयों का अध्ययन किया। वे 13 वर्ष की आयु में काव्य रचना करने लगे थे। अपने भाई ज्योतिन्द्रनाथ ठाकुर के साथ उन्होंने संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। वे काव्य मर्मज्ञ तो थे ही, संगीत मर्मज्ञ भी थे। उन्होंने 2230 गीतों की रचनायें की, उनकी अधिकतर रचनायें तो उनके गीतों में शामिल हो चुकी है। 18 वर्ष की आयु में वे पढ़ाई के लिये लंदन गये, परन्तु वकालत की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाये। वे भाषा और शिक्षा के बड़े प्रेमी थे। 


देश के विभिन्न गांवों का भ्रमण करके उन्होंने अनुभव किया कि ग्रामवासियों को जब तक अच्छी शिक्षा नहीं दी जायेगी, देश की उन्नति नहीं हो सकेगी। अत: उन्होंने ग्रामवासियों को शिक्षा देने के लिये शांति निकेतन संस्था स्थापित की। कुछ समय पश्चात् एक दुसरी संस्था श्रीनिकेतन भी रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा स्थापित की गई। शांति निकेतन एक ऐसी संस्था है, जिसमें विद्यार्थियों को आदर्श मानव बनाने की शिक्षा दी जाती है। सम्पूर्ण विश्व में यही एक शिक्षा संस्था है, जिसमें विद्यार्थी को सारे काम अपने हाथों से करने पड़ते हैं। इस संस्था में भारत के विद्यार्थी तो पढ़ते ही हैं, विदेशों से भी विद्यार्थी इसमें पढऩे के लिये आते हैं।


रविन्द्रनाथ ने विभिन्न देशों का भ्रमण किया। वे जिस देश में भी गये, उन्होंने भारतीय अध्यात्म पर आधारित समानता तथा प्रेम का संदेश दिया। वे कहते थे कि ‘हम सब भाई-भाई हैं, अमीर-गरीब का भेद निरर्थक है, मनुष्य-मनुष्य में कोई अंतर नहीं है, सबसे प्रेम करना ही मानवता का सार है, प्रेम-भाईचारे का व्यवहार संसार का सबसे बड़ा सिद्धांत है।’


सन् 1905 में रविन्द्रनाथ ने देशवासियों में स्वदेश प्रेम व स्वदेशी भावना जागृत करने के लिये स्वदेशी समाज की स्थापना की। स्वदेशी की भावना ने थोड़े ही समय में जड़ें जमा ली तथा स्वदेशी स्कूल, स्वदेशी कॉलेज, स्वदेशी बैंक की मांग बढ़ती गई, जिससे देश का वस्त्र व्यवसाय और अनेकों उद्योग-धंधें पनपने लगे। रविन्द्रनाथ का यह देशवासियों को स्वावलम्बी करने का सर्वोत्तम कदम था। रविन्द्रनाथ ने राष्ट्रीय गीतों की रचना की तथा अंग्रेजी में कवितायें भी लिखी। उनकी अंग्रेजी कविताओं का संग्रह ‘गीतांजलि’ के रूप में प्रकाशित किया। सन् 1913 में उन्हें इसी पुस्तक पर विश्व के प्रसिद्ध ‘नोबल’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके सृजन में पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका, शेष लेखा, चोखेरबाली, मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं, जिन्होंने भारतीय सांस्कृतिक चेतना में जान फूंक दी। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।


उन्होंने कविताओं के अतिरिक्त उपन्यास, नाटक, गद्य काव्य, कहानी सभी विधाओं में रचना की। उनकी कवितायें कई प्रकार की हैं, जिसमें भाववाद रचनायें, आध्यात्मवादी रचनायें, राष्ट्रीय रचनायें, सुधारवादी रचनायें मुख्य हैं। गीतांजलि उनकी भाववादी रचनाओं की श्रेष्ठ रचना है। उनकी पुस्तकों का अनुवाद भारत की सभी प्रान्तीय भाषाओं में तो हुआ है, साथ में विदेशी भाषाओं में भी  हुआ है। भारत के बड़े महान पुरूष महात्मा गांधी जैसे टैगोर को गुरूदेव कहकर उनका सम्मान करते थे। उनकी प्रत्येक काव्य रचना में प्राचीन भारत के गौरव की झलक के साथ पराधीन भारत की वेदना भी मिलती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जहां प्राचीन ऋषियों की भांति मानवता का संदेश दिया है, वहीं देशभक्त की भांति युवाओं में साहस और शक्ति का रक्त संचार भी किया है।

उन्होंने अपनी रचनाओं में एक महान गुरू की भांति युवा पीढ़ी को भारत की संस्कृति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी दी है। वे एक महान शांतिदूत व मानवता के पूजारी थे। भारत के 1936 में द्वितीय युद्ध में उन्होंने सभ्यता पर ‘संकट’ शीर्षक लेख लिखकर युद्ध की निंदा की थी। उनका नाटक ‘सडक़’ विश्व विख्यात है। रविन्द्र नाथ टैगोर का लेखन इतना विशाल, विस्तृत व विविधता लिये हुये है। इसमें भारतीय संस्कृति का समावेश व समन्वय की प्रचुरता पाई जाती है। उनके काव्यधार में एक साथ ही वेदांत, वैष्णववाद, बौद्धदर्शन, सूफी मत, बाऊल सम्प्रदाय व ईसाई धर्म सभी का अभूतपूर्व समन्वय प्राप्त होता है।  


रविन्द्र नाथ का साहित्य किसी देश व काल का साहित्य नहीं है, वह साहित्य समस्त विश्व और सब कालों का है। वह संसार की मानवता से सम्बद्ध रखता है और चिर समस्याओं सम्बन्धी संदेश देता है। उनके साहित्य में किसी प्रकार के सिद्धांत की कट्टरता अथवा वाद-विवाद नहीं मिलता।


रविन्द्र नाथ टैगोर ब्रह्म समाजी तथा प्रकृति प्रेमी थे तथा मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। रविन्द्र नाथ का लक्ष्य मानवता को हर दृष्टि से सच्चा मानव बनाने और ऊंचा उठाने का था। उनकी रचनायें पूरे विश्व मानव की एकता व श्रेष्ठता का संदेश देती है। उनकी मृत्यु 7 अगस्त, 1941 को हुई, परन्तु उनकी काव्य रचनायें युगों-युगों तक रविन्द्रनाथ टैगोर को अमर बनाये रखेंगी तथा भारतीय संस्कृति को जीवित रखने और विश्व-शांति को स्थापित करने में उनके द्वारा लिखी गई काव्य रचनायें पूरे विश्व जगत के लिये प्रेरणादायक है।


 



रवींद्रनाथ टैगोर पर 10 पंक्तियाँ 

  1. रबिन्द्र नाथ टैगोर एक महान कवी थे।

  2. उनका जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुवा था।

  3. उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर था।

  4. उनकी माता का नाम शारदा देवी था।

  5. उन्हें बचपन से ही कवितायें लिखने में रूचि थी।

  6. उनके परिवार में सभी शिक्षित एवं कलाप्रेमी थे।

  7. उन्हें वकालत की पढाई के लिए इंगलैंड भेजा गया था।

  8. वहा से वे एक साल में ही वापस लौट आये।

  9. हमारे देश का राष्ट्रगान "जन गन मन" उन्होंने ही लिखा था।

  10. उनकी मृत्यु 7 अगस्त 1941 में कोलकाता में हुई थी।



लेखक -
मनीराम सेतिया, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य
109 एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर

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