Jayanti special : 2 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर विशेष

जय जवान - जय किसान’ का नारा देने वाले सादगी व ईमानदारी की मिसाल भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री

भारतीय स्वाधीनता का सही नेतृत्व देने वाले एवं जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना करने वाले मानवता के पुजारी, भारत के महान नेता लाल बहादुर शास्त्री सज्जनता, त्याग, सादगी व ईमानदारी की साक्षात मूर्त थे, जिनके प्रधानमंत्री काल में उनकी सूझबूझ एवं कुशल नेतृत्व से भारत ने पाकिस्तानी फौज को मात दी थी तथा ‘जय जवान - जय किसान’ का नारा देकर किसानों एवं सैनिकों के मनोबल को ऊंचा उठाया था। शास्त्री जी के क्रियाकलाप सैद्धांतिक न होकर व्यवहारिक तथा जनता की आवश्यकता के अनुरूप थे। 2 अक्टूबर, 1904 में शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के घर जन्मे लाल बहादुर शास्त्री की प्रारम्भिक शिक्षा घर में हुई थी। इन्होंने सन् 1925 में स्नातक शास्त्री की डिग्री प्राप्त की, तभी से उनके नाम के आगे शास्त्री शब्द सदा के लिए जुड़ गया। स्नातक होने के पश्चात् उन्होंने देश सेवा का व्रत लेते हुए राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। वे सच्चे गांधीवादी थे तथा सारा जीवन सादगी से बिताते हुए गरीबों की सेवा में लगाया तथा भारत की स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने गांधीजी के 1921 के असहयोग आंदोलन, 1930 के दांडी मार्च तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। गांधीजी ने 8 अगस्त, 1942 को अंग्रेजों को ‘भारत छोड़ो’ व भारतीयों को ‘करो या मरो’ का आदेश दिया था। उस नारे को शास्त्री जी ने ‘करो’ नहीं ‘मारो’ में बदलकर आजादी की क्रांति को पूरे देश में फैला दिया था।

शास्त्री जी ने लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित ‘लोक सेवक समाज’ के सदस्य बनकर उल्लेखनीय योगदान दिया। इनके प्रथम राजनैतिक गुरू राजर्षि पुरूषोत्तम टंडन थे, जो शास्त्री जी के सरल, ईमानदार व्यवहार के कारण उनको अत्यन्त प्रिय थे। शास्त्री जी 1930 से 1940 तक अधिकतम समय कारागार में रहे तथा कारागार में उन्होंने राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विचारकों के ग्रंथों प्रमुखत: हेराल्ड, हीगल,  माक्र्स व लेनिन आदि के बारे में अध्ययन किया तथा मेडम क्यूरी की जीवनी का हिन्दी अनुवाद किया। 1940 में आचार्य विनोबा भावे के सत्याग्रह आंदोलन में शास्त्री जी ने भाग लिया था। उन्हें एक वर्ष का कारावास हुआ।

15 अगस्त, 1947 को देश के स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में पुलिस तथा परिवहन मंत्रालय का दायित्व बखूबी निभाया। सन् 1949 में शास्त्री जी गृह मंत्री के पद पर आसीन थे, तब छात्र-छात्राओं के आंदोलन में भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए उन्होंने लाठीचार्ज के स्थान पर ‘पानी की बौछार’  का आदेश दिया था, जिसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा। शास्त्री जी में असाधारण नैतिकता का गुण था। सन् 1952 में जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल में वे रेलमंत्री थे, तब एक रेल दुर्घटना होने पर उन्होंने नैतिकता के नाते अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया  था। शास्त्री जी ने केन्द्र सरकार के वाणिज्य, उद्योग, गृह मंत्री के रूप में कार्य करके देश की महान सेवा की तथा राजकीय विभागों में फैली अव्यवस्थाओं को दूर करने का भरसक प्रयास किया। शास्त्री जी आयुर्वेद चिकित्सा के बड़े प्रबल पक्षधर थे तथा इस पद्धति को एलोपैथिक चिकित्सा से अधिक कारगर मानते थे। उनमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा हुआ था तथा उच्च पदों पर रहते हुए, वे विनम्र थे तथा उनमें लोक कल्याण की भावना थी तथा पदलिप्सा उनमें लेशमात्र भी नहीं थी।


27 मई, 1964 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के निधन के पश्चात् शास्त्रीजी को सर्वसम्मति से देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। जिस समय शास्त्री जी ने देश की बागडोर संभाली, उस समय देश में अनेक चुनौतियां थी। देश की गरीबी की समस्या के बारे में शास्त्री जी ने कहा था कि मेरी इच्छा है कि मैं देश की जनता को गरीबी के बोझ से मुक्त कर सकूं। उन्होंने गरीब, शोषित वर्ग सहित प्रत्येक वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया। अनाज के अभाव को दूर करने के लिए शास्त्री जी ने घर-घर खेती का अभियान चलाने तथा आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी भारतवासियों को सोमवार का उपवास रखकर केवल एक समय भोजन करने के लिए बल दिया। उन्होंने कहा था कि भारत के लोग किसी के भरोसे न रहकर आत्मनिर्भर बनें। वे सदा विश्व शांति स्थापित करने का प्रयास करते रहे तथा रूस के साथ मित्रता को बढ़ावा दिया। उनमें सबल इच्छाशक्ति, तीक्ष्ण बुद्धि और तीव्र समर्पण की भावना छिपी थी तथा उन्होंने देश का आत्मसम्मान व आत्मविश्वास पुन: प्रतिष्ठित किया।

15 अगस्त, 1965 को स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा था- ‘हम रहें या ना रहें, लेकिन यह झंडा रहना चाहिए और देश रहना चाहिए। मुझे विश्वास है कि यह झंडा रहेगा, भारत का सिर ऊंचा रहेगा तथा संसार के सभी देशों में भारत एक बड़ा देश होगा।’ 1965 में पाकिस्तान के भारत पर आक्रमण करने पर शास्त्री जी ने पाकिस्तानी आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब देने का आदेश दिया तथा ओजस्वी स्वर में कहा था कि ‘इस बार युद्ध भारत की धरती पर नहीं, बल्कि पाकिस्तान की धरती पर होगा।’ उनके ‘जय जवान - जय किसान’ के नारे ने भारत की जनता का मनोबल बढ़ाया तथा किसानों और सैनिकों के माध्यम से देश में चमत्कारी उत्साह फूंक दिया। भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराकर अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर लोहा मनवाया। उनकी नम्रता व सादगी के पीछे उनके अंदर एक परिपक्व मस्तिष्क, दूरदृष्टि और गम्भीर विवेक था।  

शास्त्री जी ने कहा था कि हम सदा इस पक्ष में रहे हैं कि परमाणु हथियारों पर नियंत्रण हो। भारत-पाक समस्या और कश्मीर की समस्या को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में कई बार उठाया। शास्त्री जी ने कहा था कि विश्व-शांति और निरस्त्रीकरण की समस्या के लिए हमारा देश संयुक्त राष्ट्र संघ का पूरा समर्थन करता है 11 जनवरी, 1966 में ताशकंद समझौते के दौरान इनकी मृत्यु हुई, जो कि आज तक रहस्यमय बनी हुई है। मरणोपरांत शास्त्री जी की देशभक्ति, सादगी व ईमानदारी के लिए इन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। आज देश को ऐसे ही सशक्त नेतृत्व की जरूरत है, जो अपनी हिम्मत से विपरीत परिस्थितियों की दिशाएं मोड़ दे। उनके आदर्श व सिद्धांतों को अपनाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना




मनीराम सेतिया  
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य
109 एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर
मो. 98871-22040








लाल बहादुर शास्त्री के अनमोल विचार

हम अपने देश के लिए आजादी चाहते है,

लेकिन दूसरों का शोषण करके नही,

ना ही दूसरों को नीचा दिखाकर,

में अपने देश की आजादी ऐसे चाहता हूं,

की अन्य देश मेरे देश से कुछ सीख सके,

और मेरे देश के संसाधन मानवता के लाभ के लिए प्रयोग हो सके।



हमें हमारे देश को मजबूत बनाने के लिए लोगो में एकता स्थापित करनी होगी।



हमारी ताकत और स्थिरता के लिए सबसे जो जरुरी काम है,

लोगो में एकता और एकजुटता स्थापित करना है।



यदि पाकिस्तान का हमारे देश के किसी भी हिस्से को हड़पने का इरादा है,

तो उसे नए सिरे से सोचना चाहिए,

मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि बल का बल से सामना होगा,

और हमारे खिलाफ आक्रामकता कभी भी सफ़ल नही होने दी जायेगी।


 

हम दुनिया में सम्मान तभी पा सकते हैं,

जब हम आंतरिक रूप से मजबूत हो,

और अपने देश से गरीबी एवं बेरोजगारी को दूर कर सकें।

 

अनुशासन और एकजुट कार्यवाही राष्ट्र की शक्ति का वास्तविक स्रोत है।

 

उसकी जाति, रंग या नस्ल जो भी हो,

हम एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य की गरिमा में,

और उसके बेहतर,

 

मैं हमेशा अपने मन में दूसरों को ऐसी सलाह देने में असहज महसूस करता रहा हूँ,

जिस पर मैं खुद अमल नही कर रहा होता।

 


हमें शांति के लिए बहादुरी से लड़ना चाहिए,

मानो हम युद्ध में लड़ रहे हो।

 


हमें उन कठिनाइयों का सामना करना होगा,

जो हमारे समक्ष है

और अपने देश की खुशी और सुख-समृद्धि के लिए निरंतर काम करना होगा।



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