राजस्थान द्वारा राज्य के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को दिनांक 29/05/2020 को एक परिपत्र जारी कर एस.सी./एस.टी. एक्ट में अपराधी को थाना स्तर पर गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किए जाने के आदेश दिए गए थे और इसी कड़ाई से पालना की जाने हेतु भी राजस्थान के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया गया है।
श्रीगंगानगर : राजस्थान अनुसूचित जाति आयोग अध्यक्ष खिलाड़ीलाल बैरवा ने आज गोल बाजार स्थित अम्बेडकर चौक का अवलोकन किया तथा भव्य चौक निर्माण के लिए समाज के लोगों की सराहना की। कालूराम मेघवाल व बंटी वाल्मीकि की अगुवाई में उन्होंने अवलोकन किया। इस मौके पर अनुसूचित जाति-जनजति आरक्षण मंच जिलाध्यक्ष कालूराम मेघवाल तथा दलित एक्शन कमेटी जिलाध्यक्ष पार्षद बंटी वाल्मीकि के नेतृत्व में शिष्टमण्डल ने राजस्थान अनुसूचित जाति आयोग अध्यक्ष खिलाड़ीलाल बैरवा को विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए ज्ञापन सौंपकर अविलम्ब आवश्यक कार्यवाही करने की माँग की।
इस अवसर पर डुंगरराम इंदलिया, टीकमचंद भाटिया, सत्यनारायण नागवंशी, खेतपाल बारूपाल, विमला देवी मेघवाल, अरविंद जोशी, कस्तुरीलाल जस्सल, अमन महे, रूप बैंस, सुखचैन सिंह धालीवाल, जबर सिंह, गौतम, सुधीर, परमानंद, सुभाष, भगत, मानाराम कड़ेला, दुलीचंद तुंदवाल सहित अनुसूचित जाति, जनजाति आरक्षण मंच तथा दलित एक्शन मंच पदाधिकारी व कार्यकर्ता उपस्थित थे।
कालूराम मेघवाल तथा बंटी वाल्मीकि ने कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट-1989 की धारा 3(1) में दर्ज प्रकरणों में अपराधी की गिरफ्तारी थानों में की जाकर न्यायालय में पेश किए जाने हेतु एडीजीपी (अपराध) राजस्थान द्वारा जारी परिपत्र के खिलाफ समता आंदोलन समिति के अध्यक्ष पाराशर शर्मा द्वारा माननीय न्यायालय में दायर रिट पिटीशन में सरकार से मांगें गए जवाब का लम्बे अंतराल के बाद एडवोकेट जनरल द्वारा जवाब पेश न कर मामले में ढुलमुल रवैया अपनाने के कारण कड़ी कार्यवाही करने तथा अविलम्ब जवाब प्रस्तुत करने के लिए निर्देशित किया जाए।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट-1989 की धारा 3(1) में दर्ज प्रकरणों में जांच अधिकारी द्वारा अपराधी को थाना स्तर पर गिरफ्तार न करके सीधे न्यायालय में पेश करने का प्रावधान सिस्टम में ला रखा है। एडीजीपी (अपराध) राजस्थान द्वारा राज्य के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को दिनांक 29/05/2020 को एक परिपत्र जारी कर एस.सी./एस.टी. एक्ट में अपराधी को थाना स्तर पर गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किए जाने के आदेश दिए गए थे और इसी कड़ाई से पालना की जाने हेतु भी राजस्थान के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को निर्देशित किया गया है।
इस परिपत्र के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर में समता आंदोलन समिति के अध्यक्ष पाराशर शर्मा द्वारा यह कहते हुए रिट पिटीशन दायर की गई कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट में अर्नेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार के मामले में यह निर्धारित किया गया था कि जिन प्रकरणों में 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है, में अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं किया जाए, पहले सुनिश्चित किया जाए कि गिरफ्तारी की क्यों आवश्यकता है और गिरफ्तारी की आवश्यकता है तो पहले पुलिस धारा 41ए सीआरपीसी की पालना करे।
कालूराम मेघवाल व बंटी वाल्मीकि ने कहा कि अर्नेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ बिहार में यह निर्णय आईपीसी की धारा 498 में दिया गया था, जबकि एससी/एसटी एक्ट एक प्रोविजनल धारा है, जिस पर यह निर्णय लागू नहीं होता है और इसमें दर्ज अपराध में अपराधी की थाना स्तर पर गिरफ्तारी कर और न्यायालय में पेश किए जाने से पूर्व में प्रावधान किए गए थे।
राजस्थान में एक और प्रोविजनल एक्ट भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की धारा 7 पीपी एक्ट के तहत एसीबी राजस्थान में अधिकारियों-कर्मचारियों को भ्रष्ट आचरण के चलते रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार करती है तो उन्हें निजी मुचलका पर जमानत दिए जाने की बजाय उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया जाता है। जबकि एससी/एसटी एक्ट भी एक प्रोविजनल एक्ट है तथा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की धारा भी एक प्रोविजनल एक्ट है।
इसी प्रकार आबकारी अधिनियम में भी अपराधी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जाता है एवं जुआ-सट्टा के मामले में भी थाने में गिरफ्तारी कर न्यायालय में पेश किया जाता है। जबकि अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट एक गम्भीर एक्ट है तथा भारत में अनुसूचित जाति-जनजाति को प्रोक्टशन देने के लिए बनाया गया है, लेकिन धारा 41 के नाम पर दुरूपयोग किया जा रहा है, जिसे तत्काल प्रभाव से रोकने की आवश्यकता है।
इसलिए अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण मंच की मांग है कि राजस्थान सरकार के एडवोकेट जनरल से सरकार की ओर से माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर द्वारा बार-बार मांगें जाने पर भी उनके द्वारा जवाब पेश नहीं किया गया है। इसलिए एडवोकेट जनरल को निर्देशित किया जाए कि अविलम्ब माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर में जवाब पेश किया जाए, जिससे कि एडीजीपी (अपराध) द्वारा जारी परिपत्र की पालना हो सके, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एससी/एसटी एक्ट में अपराधी की थाना स्तर पर गिरफ्तारी की जाना जायज है तथा गिरफ्तारी के पश्चात् उसे न्यायालय में पेश किया जाये। इसके बाद माननीय न्यायालय का जो भी अंतिम निर्णय हो, उसकी विभाग द्वारा पालना की जाये। इस प्रकार प्रभावी कार्यवाही से दलित समाज के हितों की रक्षा हो सकेगी तथा उन्हें बड़ी राहत मिलेगी तथा इस एक्ट का उद्देश्य सार्थक हो सकेगा।
इस मौके पर अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट-1989 की धारा 3(1) में एससी/एसटी सैल में डीवाईएसपी स्तर के जांच अधिकारी एससी/एसटी जाति के ही लगाने की मांग करते हुए कहा कि विश्वसनीय सूत्रों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इस एक्ट में दर्ज लगभग 90-95 प्रतिशत मामलों में जांच अधिकारी द्वारा महज इसलिए एफ.आर. लगा दी जाती है कि जांच अधिकारी एवं अपराधी की जाति एक ही होती है। ऐसे में परिवादी के न्याय नहीं मिल पाता तथा यह एक्ट मात्र कागजों में ही रह गया है। इसलिए एससी/एसटी एक्ट में दर्ज प्रकरणों की जांच में सीओ, एससी/एसटी सैल के अधिकारी भी एससी/एसटी समुदाय से ही लगाए जाएं, ताकि इस एक्ट का उद्देश्य पूरा हो सके तथा एससी/एसटी समाज के लोगों को न्याय मिल सके।
इसके साथ-साथ अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग की दूसरे राज्यों से राजस्थान में विवाह होकर आई विवाहित युवतियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ दिए जाने तथा जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की माँग भी की गई है। उन्होंने कहा कि जब पंजाब, हरियाणा, चण्डीगढ़, दिल्ली आदि राज्यों में इन विवाहित महिलाओं को एससी/एसटी वर्ग का जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया है तो फिर राजस्थान में विवाहित होकर अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के लोगों को मिलने वाले आरक्षण से वंचित क्यों रखा जा रहा है
तथा जाति प्रमाण-पत्र क्यों नहीं जारी किए जा रहे हैं? इसलिए दूसरे राज्यों से विवाह होकर राजस्थान आई आरक्षित वर्ग की महिलाओं को जाति प्रमाण-पत्र जारी किए जाएं तथा राजस्थान में सरकारी नौकरियों में रोस्टर के अनुसार आरक्षण का लाभ दिया जाए एवं इस आश्य का नोटिफिकेशन राज्य सरकार से जारी करवाया जाए, ताकि अनुसूचित जनजाति-जनजाति समाज को राहत मिल सके।

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