अमर शहीद सुखदेव स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रान्तिकारियों में से एक थे, जो शहीद-ए-आजम भगत सिंह व राजगुरु के साथ मात्र 23 वर्ष की छोटी सी उम्र में 23 मार्च, 1931 को हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उनका जन्म 15 मई, 1907 को पंजाब के लुधियाना के नौधरा गाँव में हुआ था। मात्र 2 वर्ष की आयु में पिताजी रामलाल थापर की मृत्यु हो गई थी, इस पर उनका पालन-पोषण इनके ताऊजी महान क्रान्तिकारी लाला चिन्तराम द्वारा किया गया। लाला चिन्तराम की विचारधारा की प्रेरणा से सुखदेव ने मातृभूमि पर सर्वस्व न्यौछावर करने का निश्चय किया था। सुखदेव में बचपन से ही ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों के प्रति भारी रोष था
जो उन्होंने पाठशाला में सातवीं कक्षा में पढते समय अंग्रेज अधिकारी को परेड में सलामी देने से मना कर दिया तथा प्रधानाध्यापक द्वारा खूब समझाने पर भी टस से मस नहीं हुए, जिसके कारण अंग्रेज अधिकारी व शाला प्रधानाध्यापक द्वारा उनकी खूब पिटाई की गई थी। 16 वर्ष की आयु में इनकी माता ने इनके विवाह करने की बात कही तो सुखदेव ने कहा कि ‘माँ, मैं घोड़ी पर नहीं फांसी पर चढूंगा।’ माँ समझ गई कि बेटा किस रास्ते पर जाएगा। सुखदेव आजादी के दीवाने थे, जिनमें देशभक्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी तथा महान साहसी क्रान्तिकारी थे।
नेशनल कॉलेज में पढ़ते समय वे भगत सिंह के सम्पर्क में आए तथा लाहौर में इन्होंने अन्य साथियों से सहयोग से ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया। सुखदेव एक कुशल संगठक थे। उन्होंने भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए नवयुवकों में क्रान्ति की ज्वाला जागृत की। 13 अप्रेल, 1919 में जलियांवाला काण्ड में निहत्थे भारतीयों पर अंग्रेजी सरकार द्वारा किए गए नरसंहार के कारण सुखदेव व उनके साथियों में क्रान्ति की ज्वाला तीव्र हो गई थी। 1920 में सुखदेव ने साथियों के साथ एक क्रान्ति दल में ‘कृष्ण विजय’ नाटक का मंचन किया तथा जनता में क्रान्ति की जागृति पैदा की। ब्रिटिश संसद ने भारत के लोगों की स्वतंत्रता की माँग में सर जान साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन भेजा,
जिसमें एक भी भारतीय नहीं था, इस पर सभी क्रान्तिकारी दलों ने इसका विरोध किया। सरकार के प्रतिबंध लगाने पर भी 28 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में भारी जलसा हुआ। सुखदेव, भगत सिंह व राजगुरु ने इसका विरोध किया। सरकार ने रात्रि को तीनों को गिरफ्तार कर लिया। साइमन कमीशन के विरोध जुलूस का नेतृत्व गर्म दल के नेता पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कर रहे थे। जुलूस पर अंग्रेजों द्वारा लाठीचार्ज किया गया, जिसमें अनेकों निर्दोष लोग घायल हुए तथा लाला लाजपत राय की छाती पर लाठियां लगने के कारण लालाजी 17 नवम्बर, 1928 को दुनिया को छोड़ गये, तभी सुखदेव व राजगुरू ने प्रतिज्ञा की कि ‘कसम भारत माँ की खून का बदला खून।’ इस चुनौती को स्वीकार करते हुए 17 दिसम्बर, 1928 को लालाजी के हत्यारे डीएसपी जेपी सांडर्स की सुखदेव, भगत सिंह व राजगुरू ने हत्या कर दी
तथा अगले दिन पोस्टर लगा दिए कि हमने जेपी सांडर्स का वध करके महान राष्ट्रीय नेता के बलिदान का बदला ले लिया है। सरकार ने इन्हें पकडऩे के लिए लाहौर की नाकाबंदी कर दी, परन्तु क्रांतिकारी दुर्गा भाभी ने इन्हें सुरक्षित बाहर निकलने में सहायता की। सुखदेव ने लाहौर में पहुंचकर पुन: ‘बम बनाने की फैक्ट्री’ शुरू कर दी।
8 अप्रेल, 1929 को सरदार भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने एसेम्बली बमों से धमाके किए व ‘जय हिन्द’ के नारे लगाए। बम केस की जाँच करते समय पुलिस ने सुखदेव को बम फैक्ट्री से गिरफ्तार कर लिया। भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त व राजगुरु भी गिरफ्तार कर लिए गए, चारों पर मुकदमा चला। भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को सांडर्स हत्याकाण्ड में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई।
फांसी की सजा 24 मार्च, 1931 को दी जानी थी, परन्तु 23 मार्च को ही सांय 7 बजे तीनों को फांसी पर लटका दिया गया। फांसी देने से पहले जल्लाद के पूछने पर कि फांसी पर कौन पहले चढ़ेगा, तो सबसे पहले अमर शहीद सुखदेव ने फांसी पर झूलने की मुस्कराकर स्वीकृति दी। तीनों हँसते हुए फांसी के फंदे को चूमते हुए देश के लिए बलिदान हो गये। तीनों शहीदों द्वारा फांसी की कोठरी पर गाये जाने वाले गीत की ध्वनि मानो आज भी सुनाई दे रही है - ‘हमारी हवा में रहेगी ख्याल की बिजली, यह मुश्ते खाक है फानी रहे या न रहे, खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।’ अपने देश के स्वाभिमान व स्वतंत्रता के लिए सुखदेव ने शहादत देकर जता दिया कि भारत माता की आन पर मिटने वालों की कमी नहीं है। सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों के कारण ही देश को 1947 में आजादी मिली, ऐसे स्वाभिमानी देशभक्त को उनकी जयंती पर नमन।


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