बैसाखी पर्व पर विशेष रंग रंगीला सांस्कृतिक व धार्मिक समरसता का पर्व -baisakhi parv par vishesh rang rangeela sanskritik va dhaarmik samarasata ka parv

बैसाखी पर्व पर विशेष रंग रंगीला सांस्कृतिक व धार्मिक समरसता का पर्व - baisakhi parv par vishesh rang rangeela sanskritik va dhaarmik samarasata ka parv




बैसाखी एक राष्ट्रीय त्यौहार है, जो कि प्रमुखतया पंजाबी समुदाय द्वारा बैसाखी पर्व 13 अथवा 14 अप्रैल को मनाया जाता है। बैसाखी सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक समरसता तथा एकता का पर्व है। यह सिक्ख धर्म के पवित्र त्यौहारों में से एक है तथा देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाले सभी धर्म के लोग अलग-अलग नामों से मनाते हैं। केरल में यह त्यौहार ‘विशु’ कहलाता है। असम में ‘विहू’ के रूप में जाना जाता है। ‘ बैसाखी’ पर्व का सम्बन्ध गेहूँ की फसल की कटाई से है। इस दिन खेतों में रबी की फसल पक कर तैयार होती है तथा पकी फसल की कटाई प्रारम्भ की जाती है। बैसाखी पर्व का सम्बन्ध सिक्ख धर्म की स्थापना से है। 

13 अप्रैल, 1699 में सिखों के दसवें गुरु गोविद सिंह ने आनन्दपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की। गुरू गोविन्द सिंह ने जन समुदाय के सम्मुख नंगी तलवार लेकर बलिदान मांगा तो दयाराम खत्री, धर्मदास जाट, मोहकम चन्द धोबी, भाई साहब चन्द नाई तथा हिम्मत राय कुम्हार एक-एक कर आगे आये तथा बलिदान देने के लिए खुद को समर्पित किया। उनकी निष्ठा व देश के लिए शहीदी का जज्बा देखते हुए गुरू जी ने उन्हें अमृत छकाया तथा ‘पांच प्यारे’ की उपाधि दी एवं उन्हें कृपाण, कड़ा, केश, कंघा व कच्छा पांच चिन्ह सदैव अपने पास रखने का संकल्प दोहराया। पांच प्यारों को पवित्र वाणी के साथ खालसा बनाया, जो देश, जाति और धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहें। वहीं संगठन सिक्ख धर्म के नाम से चल रहा है। इसके साथ आज बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में जलियांवाले बाग में अंग्रेजों द्वारा क्रुरता दिखाते हुए निहत्थे हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। देश की आजादी के लिए उन शहीदों की कुर्बानियों को भी आज याद करने का दिन है।

आज के ही दिन राजा जनक को महान यज्ञ के दौरान अवधूत अष्टवक्र से ज्ञान प्राप्ति हुई थी।
बैसाखी के त्यौहार को पंजाबी समुदाय के लोग खुशी से मनाते हैं। आज के दिन गुरूद्वारों में कीर्तन होते हैं। लोग अरदास, प्रार्थना करते हैं तथा पंजाबी वेशभूषा पहनकर, नगाड़े बजाते हुए भंगड़ा, जटा आई बैसाखी गाते हुए खुशी का इजहार करते हैं। बैसाखी के दिन बैसाखी मेला आयोजित किये जाते हैं। कई तरह के पशु मेलों का आयोजन भी होता है। जहाँ कई प्रकार के पशुओं की खरीद-फरोख्त होती है।

आज के दिन पवित्र नदियों, सरोवर व तालाबों में स्नान करना पुण्य माना जाता है। सरोवरों में स्नान के बाद लड्डू व चूरमे का प्रसाद बांटा जाता है। लोग अपनी श्रद्धानुसार पुण्य-दान करते हैं। वैशाखी के पर्व पर बच्चों को बेर व सूखे मेवों के हार बनाकर पहनाये जाते हैं। हिन्दुओं के लिए यह पर्व नववर्ष के आगमन का दिन है। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से भी बैसाखी त्यौहार बहुत ही शुभ व मंगलकारी होता है, क्योंकि इस दिन आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है, इसलिये इस दिन बैसाख महीने की शुरूआत भी मानी जाती है तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से इसे मेष सक्रांति भी कहा जाता है।

आपसी भाईचारे का प्रतीक बैसाखी त्यौहार पकी फसलों की कटाई के कारण किसानों भाईयों को आर्थिक सम्पन्नता प्रदान करता है। इसी कारण से वैशाखी को रंग-रंगीला, समृद्धि व खुशियों के त्योहार के रूप में पंजाब व हरियाणा में मनाया जाता है। खुशहाली, हरियाली और देश की समृद्धि के लिए पंजाबी समुदाय के लोग बैसाखी के दिन पूजा व अर्चना करते हैं। सभी देशवासियों को बैसाखी पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनायें।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ