संत कबीर जयंती (4 जून) पर विशेष -Special on Sant Kabir Jayanti (4th June)

संत कबीर जयंती (4 जून) पर विशेष -Special on Sant Kabir Jayanti (4th June)



अंधविश्वास, संकीर्णताओं, कुरीतियों का खंडन करके मानव को कल्याण का पथ दिखाने वाले महान संत कबीर

‘जीव दया और आत्म पूजा, सतगुरु की भक्ति देव नहीं दूजा’ का मत रखने वाले कबीर एक महान सन्त कवि और समाज सुधारक थे, जिन्होंने मानव समाज को मोह और अज्ञान की नींद से जगाने, चेताने एवं समाज सुधार का बीड़ा उठाया। वे अभूतपूर्व साहस एवं निर्भयता लेकर प्रकट हुए युगपुरुष थे, जिन्होंने सभी प्रकार के भेदभाव, असत्य, अनाचार, अधर्म, अन्धविश्वास और अनर्गल रूढ़ी परम्पराओं का विरोध करते हुए, सर्वथा सत्य का उपदेश दिया एवं प्रचार-प्रसार किया। संत कबीर आत्मदर्शी एवं आत्मज्ञानी थे, उन्हें संसार में किसी से भी मोह न था, वे सभी का हित चाहते थे। उनका सत्य ज्ञान मानव मात्र के कल्याण के लिये है। वे मानवता के परम आदर्श थे। उन्हें संत मत का प्रवर्तक माना जाता है। उनके द्वारा उपदेशित अमृतवाणी, उनकी शिक्षाएं एवं सिद्धान्त से जो सामाजिक एवं धार्मिक विकास हुआ, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता तथा वे आज भी प्रासांगिक हैं।

नीरू जुलाहा के घर कबीर का लालन-पोषण हुआ, परन्तु कबीर खुद की कोई जात नहीं मानते थे तथा कहते थे कि मेरी जात इन्सानियत है, मेरा मजहब प्रेम और सेवा है। उन्होंने स्वामी रामानन्द को गुरू धारण किया तथा गुरू के राम नाम शब्द को गुरू मन्त्र मानकर पूरा जीवन उसी शब्द की महिमा का बखान करते रहे।

कबीर स्वयं पढ़ें लिखे नहीं थे। उन्होंने कोई भी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी परन्तु स्वाध्याय व अपने सामाजिक अनुभवों लोक व्यवहार और मानव मूल्यों की परख के आधार पर उन्होंने अपने अध्यात्मिक ज्ञान को ऐसे सीधे ढंग से प्रकट किया कि अनपढ़, अशिक्षित व्यक्ति भी सर्वव्यापी परमात्मा शक्ति के तत्व को समझकर अपना कल्याण कर सकता है। कबीर की भाषा सधुक्ड़ी है। इनकी भाषा में राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, बृज भाषा के शब्दों की बहुलता मिलती है।

कबीर के शिष्यों ने कबीर की वाणियों का संग्रह ‘बीजक’ नामक ग्रंथ में किया, जिसके तीन मुख्य भाग साखी, सबद (पद) व रमैनी है। साखियां दोहों में लिखी गई हैं तथा कबीर के दोहे मृत जीवन में जान डाल देते हैं। कबीर एक सच्चे परामर्थी थे, वे दिखावटी, धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड के विरोधी थे। वे हिन्दू-मुसलमान दोनों को उपदेश देते हुये कहते थे कि हिन्दु लोगों अब लकड़ी की माला के मनके फेरने की बजाय, मन की माला फेरो, इसी से भगवान की प्राप्ति होगी। वे मुसलमानों से कहते थे कि तुम ऊंची मीनार पर चढक़र आवाज देते हो, क्या खुदा बहरा हो गया है। वे कहते थे राम-रहीम में कोई अन्तर नहीं। तत्कालीन मुगल बादशाह सिकंदर लोदी द्वारा हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाये जाने पर कबीर ने उनका डटकर विरोध किया, जिससे मुस्लिम जनता उनके खिलाफ हो गई। परन्तु उन्होंने अपना सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।

कबीर अहिंसावादी थे, किसी भी प्राणी का वध करना, कष्ट पहुंचाना वे घोर पाप समझते थे। मुसलमानों को ईद पर अल्लाह के नाम पर गाय-बकरी काटना तथा हिन्दुओं द्वारा बकरी भैसों की हत्या करने को वे पाप व अपराध मानते थे। मनुष्य को दोहों के द्वारा वे शिक्षा देते हुये कहते हैं कि जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन, जैसा पीओगे पानी वैसी होगी वाणी। वे कहते थे कि मनुष्य को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिये। जो लोग मांस-मदिरा का सेवन करते हैं, उनका बल व बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। यंत्र-तंत्र-मंत्र विद्या के बारे में कबीर कहते हैं कि यंत्र-तंत्र-मंत्र विद्या व टोना-टोटका सब झूठ हैं, भ्रम में डालने वाले हैं, इनसे बचना ही अच्छा है। अपने दोहों के माध्यम से कबीर जी समझाते हैं कि दुख में सभी राम व खुदा का सिमरन करते हैं, परन्तु सुख में कोई सिमरन नहीं करता। यदि सुख में परमात्मा को सिमरन किया जाये, तो दुख क्यों हो। कबीर अपनी वाणी द्वारा कहते हैं कि सत्य के समान कोई तप नहीं, झूठ के समान कोई पाप नहीं, जिनके हृदय में सत्य विद्यमान हैं, उनके हृदय में परमात्मा का निवास होता है।

सत्संग के बारे में कबीर कहते हैं कि सत्संग से सुख उत्पन्न होता है और कुसंगति से दुख। सज्जन लोगों की संगति करनी चाहिये। कबीर फिर कहते हैं कि जो तुम्हारे लिये कांटे बोये, उसके लिये फूल बोओ, तुम्हारे फूल के फूल ही रहेंगे, उनके कांटे भी त्रिशुल हो जायेंगे। कबीर वाणी द्वारा समझाते हैं कि चाहे अपने आपको किसी प्रकार से ठगा लो, परन्तु दूसरों को छल-कपट कर नहीं ठगना चाहिये तथा दीन-दुखियों, निर्बल प्राणियों को कभी नहीं सताना चाहिये। भक्ति व साधना के बारे में कबीर कहते हैं कि कामनाओं से वशीभूत क्रोधी व लालची मनुष्य भक्ति नहीं कर पाते, जाति-वर्ग कुल मर्यादा को छोडक़र कोई सच्चा वीर सत्पुरुष की भक्ति करता है। भक्ति ही मुक्ति की सीढ़ी है।
कबीर समझाते हैं कि जो मनुष्य माया-मोह, राग-द्वेष, सुख भोगों में जीवन व्यतीत कर देता है, 
उसका सारा मनुष्य जीवन व्यर्थ जाता है। सच्चे संतों के संग में राम का स्मरण व भजन करके मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। कबीर स्वयं कपड़े बुनने का कार्य करते समय प्रभु भजन में तल्लीन हो जाते थे। कबीर के कुछ दोहे निम्न हैं :- ‘कबीरा जब हम पैदा हुए जग हंसा हम रोये, ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोये।’ , ‘निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।’, ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय, जो तन खोजा आपना, मुझसे बुरा ना कोय।’, ‘बंदे तू कर बंदगी तो पावे दीदार, औसर मानुष जन्म का बहुरि न बारम्बार।’  आदि कबीर के सैंकड़ों दोहे हमें जिंदगी की सच्ची राह दिखाते हैं। उनका दिव्य संत जीवन परम शोभनीय एवं दर्शनीय है तथा वे सबके लिए प्रेरणादायक हैं।  

कबीर ने मगहर में अन्तिम सांस ली, जहां आज भी उनकी मजार व समाधि स्थित है। कबीर के नाम पर चला कबीर पंथ आज तक चला आ रहा है और उनके बनाये भजन, गीत एवं उल्टवासियों को जनता बड़ी श्रद्धा से गाती और ज्ञान पाती है। कबीर जैसे महान संत व समाजसुधारक को हम सभी शत्-शत् नमन् करते हैं।


लेखक :-
मनीराम सेतिया  
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य
109 एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर

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