पं. गोविन्द बल्लभ पंत महान स्वतंत्रता सेनानी एवं राष्ट्रवादी चिंतक जन्म - 10 सितम्बर, 1887 मृत्यु - 7 मार्च, 1961
30 नवम्बर, 1928 को साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन हुए। लखनऊ में साइमन कमीशन का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू व पंत जी ने किया था। जुलूस पर पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्ण लाठी प्रहार किया गया। वल्लभ पंत ने लाठी प्रहारों को हिम्मत व निडरता के साथ सहन किया। धीरे-धीरे पंत जी राजनीति में सक्रिय होकर देश की आजादी के लिए कदम बढ़ाते रहे।
16 मई, 1930 में नमक कानून भंग करने के कारण 6 महीने के लिए जेल गए। 10 अगस्त, 1931 को इनके पुत्र श्रीकृष्णचंद पंत का जन्म हुआ। 18 फरवरी, 1932 को इन्हें महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर गिरफ्तार कर लिया गया। 1937 में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। पंत जी को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। इन्होंने दूरदर्शिता, प्रशासकीय क्षमता से सरकारी प्रशासन का संचालन किया। 9 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने पर इन्हें बम्बई में गिरफ्तार किया गया। इस प्रकार स्वाधीनता की लड़ाई में पंत जी अनेक बार जेल गए तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएं सहन की, परन्तु अपने आदर्श व सिद्धांतों से मुँह नहीं मोड़ा। स्वतंत्रता प्राप्ति तक अनेक नेताओं के साथ संघर्ष करते रहे। 15 अगस्त, 1947 को भारत देश के स्वाधीन होने पर वे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वे एक कुशल प्रशासक थे तथा सरकारी फाइलें देखने, समझने व उसे निपटाने में निपुण थे तथा सरकार का पैसा कहीं भी फालतु खर्च नहीं होने देते थे। उन्होंने मुख्यमंत्रीकाल में अनेकों महत्वपूर्ण विकास कार्य किए। उत्तरप्रदेश के कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार - जिसमें तराई के क्षेत्र में सैंकड़ों एकड़ दलदली भूमि का सुधार मुख्य है। 16500 एकड़ ‘एकजोत’ कृषि योग्य बनाई गई, जो एशिया में सबसे बड़ी जोत भूमि गिनी जाती है। इन्होंने जंगल को सुंदर पर्यटन स्थल के रूप में बदल दिया था।
गोविन्द वल्लभ पंत को गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्वर्गवास होने पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा 10 जनवरी, 1955 को केन्द्रीय गृह मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अनेकों राष्ट्रव्यापी जटिल समस्याओं को दूरदर्शितापूर्वक निराकरण किया। भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का कठिन व दुष्कर कार्य उनके कार्यकाल में सम्पन्न हुआ। इस दौरान उन्होंने विभिन्न वर्गों के आवेगों व विरोधों का संघर्ष सहन किया। गैर हिन्दी राज्यों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति दिलाने में उन्होंने उच्च कोटि की राजनीतिज्ञता का परिचय दिया। उनके कुशल नेतृत्व में जमीदारी प्रथा समाप्त हुई, ग्राम पंचायतों की स्थापना हुई, अस्पृश्यता को अवैध घोषित किया गया। पंत जी अस्पृश्यता के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कहा था कि ‘अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर कलंक है।
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इसके कारण विघटनकारी शक्तियों को बल मिलता है व जातिवाद को बढ़ावा मिलता है। हमारी अनेक सामाजिक बुराईयों की जड़ अस्पृश्यता ही है।’ पंत जी ने नागा विद्रोह, कश्मीर समस्याओं आदि को सुलझाने व देश की राजनीतिक एवं प्रादेशिक एकता को बनाये रखने के लिए भरसक प्रयत्न किए।
वल्लभ पंत जी सरल व कोमल स्वभाव के थे, उनमें देशभक्ति व सहनशीलता की शक्ति कूट-कूटकर भरी थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ के साथ-साथ महान साहित्यकार व पत्रकार भी थे। उनका नाटकों में विशेष योगदान रहा। उनकी 65 कृतियां प्रकाशित हुई। उनका नाटक ‘कोहिनूर का लुटेरा’ बहुत प्रसिद्ध हुआ तथा पूरे देश में सौ से अधिक बार मंचित हुआ। वे कहते थे- नाटक तमाम ललित कलाओं का संयोग करता ही नहीं, करके भी दिखाता है। उन्होंने अपनी लेखनी से 39 उपन्यासों का सृजन किया तथा लघुकथाऐं भी लिखी । ‘बलि का बकरा’ उनकी सुप्रसिद्ध लघुकथा थी। कलाचित्र कला व संगीत में भी उनकी रूचि थी तथा वे एक सफल पत्रकार भी थे। वे ‘नवीनतम पत्रिका’ के उपसम्पादक के साथ-साथ कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। पंत जी की राजनीतिक दूरदर्शिता और कार्यकुशलता से प्रभावित होकर भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1957 को उन्हें ‘भारत रत्न’ उपाधि से सम्मानित किय। 7 मार्च, 1961 को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। गोविन्द बल्लभ पंत जी के उत्कृष्ट देश प्रेम, उनके आदर्श कार्यशैली व आजादी के लिए उनका निस्वार्थ संघर्ष कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी जयंती पर उनको शत-शत नमन करते हैं।
लेखक _ मनीराम सेतिया
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य109 एल ब्लॉक, श्रीगंगानगर

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